जयपुर में दो दिवसीय आनंदयोग सत्संग समागम सम्पन्न, डॉ. सुरेश जी महाराज ने दिया साधना, प्रेम और निष्काम कर्म का संदेश
जयपुर में आयोजित दो दिवसीय आनंदयोग सत्संग समागम में पूज्य डॉ. सुरेश जी महाराज ने ध्यान, प्रेम, विनय और निष्काम कर्म के महत्व पर श्रद्धालुओं को संबोधित किया।

जयपुर । राजस्थान की राजधानी जयपुर में अखिल भारतीय संतमत सत्संग के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय आनंदयोग सत्संग समागम श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच सम्पन्न हुआ। 24 और 25 अक्टूबर को शास्त्री नगर स्थित अखिल भारतवर्षीय खण्डेलवाल वैश्य महासभा भवन में आयोजित इस समागम में देशभर से सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। कार्यक्रम में अखिल भारतीय संतमत सत्संग के संरक्षक एवं अष्टांग योग गुरु पूज्य डॉ. सुरेश जी महाराज (पूज्य भैय्या जी) ने आध्यात्मिक साधना, ध्यान, प्रेम, विनय और निष्काम कर्म के महत्व पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया।
भक्ति और मंगलाचरण के साथ हुआ शुभारंभ
समागम का शुभारंभ 24 अक्टूबर को पूज्य भैय्या जी के स्वागत समारोह के साथ हुआ। स्थानीय सत्संग परिवार एवं आयोजन समिति ने पुष्पहारों से उनका स्वागत किया। कार्यक्रम में मंगलाचरण, भक्तिमय भजनों और शांतिपाठ का आयोजन हुआ, जिससे पूरा परिसर आध्यात्मिक वातावरण से सराबोर हो गया। सायंकालीन सत्संग का आरंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसमें बच्चों और स्थानीय श्रद्धालुओं ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया।
नियमित ध्यान और साधना से मिलता है मानसिक विश्राम
अपने प्रथम दिवस के प्रवचन में पूज्य भैय्या जी ने कहा कि जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विश्राम आवश्यक है, उसी प्रकार मन को भी विचारों की निरंतरता से विराम देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि पूजा-अर्चना केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मन की एकाग्रता, आत्मिक विकास और परमात्मा से जुड़ाव का माध्यम है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से नियमित प्रातः एवं सायंकालीन ध्यान-साधना करने का आग्रह करते हुए कहा कि निरंतर अभ्यास से मन शांत होता है और जीवन में संतुलन स्थापित होता है। उन्होंने अपने इष्ट के प्रति एकनिष्ठ श्रद्धा रखने तथा दैनिक जीवन के प्रत्येक कार्य में परमात्मा का स्मरण बनाए रखने की प्रेरणा भी दी।

प्रेम, विनय और विश्वास को बताया आध्यात्मिक जीवन का आधार
समागम के दूसरे दिन सामूहिक शांतिपाठ के बाद पूज्य भैय्या जी ने प्रेम और विनय पर आधारित प्रवचन दिया। उन्होंने प्रेम के पांच प्रमुख गुण—अदब, लज्जा, विश्वास, संतोष और त्याग—का उल्लेख करते हुए कहा कि यही गुण साधक के आध्यात्मिक जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि सद्गुरु के प्रति विनम्रता और सम्मान आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति का आधार है। साथ ही श्रद्धालुओं को अंधविश्वास से बचने और साधना के अनुभवों के आधार पर विश्वास को मजबूत करने की सीख दी। उन्होंने संतोष और त्याग को जीवन में अपनाने तथा द्वेष से दूर रहकर सभी के कल्याण की भावना रखने का संदेश दिया।
प्रश्नोत्तर सत्र में दूर कीं आध्यात्मिक जिज्ञासाएं
समागम के दौरान आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में श्रद्धालुओं ने मन और आत्मा का अंतर, मोक्ष, आनंद, चेतना, निष्काम कर्म तथा आध्यात्मिक साधना से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे। पूज्य भैय्या जी ने इन जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कहा कि मन विचारों का केंद्र है, जबकि आत्मा आनंद और चेतना का स्वरूप है।
उन्होंने निष्काम कर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि व्यक्ति को कर्म करते समय फल की इच्छा से मुक्त रहना चाहिए तथा प्रत्येक कार्य को परमात्मा को समर्पित भाव से करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केवल आध्यात्मिक साहित्य पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसमें बताए गए सिद्धांतों का नियमित अभ्यास ही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
सैकड़ों श्रद्धालुओं ने लिया हिस्सा, कई लोगों ने प्राप्त किया नामदान
दो दिवसीय आनंदयोग सत्संग समागम में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। इस अवसर पर अनेक भाई-बहनों ने नामदान भी प्राप्त किया। आयोजन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संतमत की साधना-पद्धति, आध्यात्मिक अनुशासन, प्रेम, विनय और निष्काम कर्म के महत्व को समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में स्थानीय सत्संग परिवार और आयोजन समिति की महत्वपूर्ण भूमिका रही। समापन अवसर पर संस्था के संचालकों राजेंद्र कुमार सैनी, नीरज सैनी, चेतन प्रकाश शर्मा, योगेंद्र माथुर, डॉ. केदार गुप्ता और विजय शंकर शांडिल्य सहित अन्य पदाधिकारियों ने पूज्य भैय्या जी एवं सभी श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया।

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