सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: तेजाब हमले के पीड़ितों को रेल रियायत नीति में सामाजिक न्याय विभाग भी हो शामिल
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को तेजाब हमले के पीड़ितों के लिए प्रस्तावित रेल रियायत नीति का मसौदा छह हफ्ते में पेश करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तेजाब हमले के पीड़ितों को बेहतर इलाज के लिए यात्रा सुलभ कराने के मकसद से रेलवे रियायत नीति तैयार करने में दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग की सक्रिय भागीदारी का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन आने वाले इस विभाग को अंतिम नीति निर्धारण की प्रक्रिया से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए।
पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) अर्चना पाठक दवे को प्रस्तावित नीति का मसौदा छह सप्ताह के भीतर अदालत के रिकॉर्ड पर दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि केंद्र सरकार ने याचिकाकर्ता एनजीओ अतिजीवन सोसाइटी सहित अन्य संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श करके एक मसौदा नीति तैयार कर ली है।
केंद्र सरकार ने 13 अगस्त को पीठ को सूचित किया था कि वह तेजाब हमले के पीड़ितों को रेल किराए में रियायत देने की नीति बनाने पर सैद्धांतिक रूप से सहमत है। इसके बाद शीर्ष अदालत ने रेल मंत्रालय से इस विषय पर मानवीय रुख अपनाते हुए पीड़ितों को उदारतापूर्वक छूट देने पर विचार करने को कहा था।
अदालत में एएसजी अर्चना पाठक दवे ने बताया कि केंद्र सरकार इन पीड़ितों को 'मरीज श्रेणी' के तहत यह सुविधा देने का विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार को पीड़ितों को अलग से दिव्यांग श्रेणी में रखने को लेकर कुछ आपत्तियां हैं, क्योंकि उस श्रेणी में शामिल अन्य लोगों को रेलवे की तरफ से ऐसी रियायतें नहीं दी जाती हैं।
विधि अधिकारी ने अदालत को यह भी बताया कि दिव्यांगजनों की 21 श्रेणियां हैं जिन्हें रेलवे पहले से रियायतें प्रदान कर रहा है। इसके अतिरिक्त रेलवे सभी श्रेणियों के दिव्यांगजनों के लिए एक आपातकालीन यात्रा कोटा शुरू करने पर भी विचार कर रहा है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पीड़ितों को पुनर्निर्माण सर्जरी और जरूरी इलाज के लिए चार से पांच साल तक लगातार बड़े अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि घावों और सर्जरी के बाद होने वाली समस्याओं के कारण पीड़ितों को वातानुकूलित डिब्बों में यात्रा की आवश्यकता होती है, लेकिन महंगा किराया और आरक्षण के लिए मेडिकल प्रमाणपत्र हासिल करने की जटिल प्रक्रिया उनके लिए बड़ी बाधा बनती है।
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