मुजफ्फरनगर: 4 माह में 22 फांसी की सजा सुनाने वाले जज से वापस लिए गए हत्या के 97 मामले
मुजफ्फरनगर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने प्रशासनिक आदेश जारी कर एडीजे रवि कुमार दिवाकर की अदालत से गंभीर अपराधों की फाइलें वापस लीं।

मुजफ्फरनगर की एक अदालत में हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े 97 लंबित मामलों को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की अदालत से वापस ले लिया गया है। यह प्रशासनिक आदेश मुजफ्फरनगर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह द्वारा जारी किया गया है। अब इन सभी मामलों की सुनवाई स्वयं जिला एवं सत्र न्यायाधीश करेंगे।
वापस लिए गए मुकदमों में ऐसे अपराध शामिल हैं जिनमें मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है। प्रशासनिक आदेश में मामलों को वापस लेने का कोई विशिष्ट कारण स्पष्ट नहीं किया गया है। हालांकि, यह कदम जज दिवाकर द्वारा महज चार महीनों के भीतर 10 अलग-अलग मामलों में 22 दोषियों को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उठाया गया है।
अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, जज दिवाकर ने अप्रैल से अगस्त के बीच रिकॉर्ड संख्या में मृत्युदंड के फैसले सुनाए। इनमें वकील समीर सैफी हत्याकांड, 15 साल पुराना मां-बेटे की हत्या का मामला, ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड की हत्या और चुनावी रंजिश से जुड़े पुराने मामले शामिल हैं। 13 अगस्त तक उनकी अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजाओं की कुल संख्या 22 तक पहुंच गई थी।
कानूनी प्रावधानों के तहत सत्र न्यायालय द्वारा दी गई किसी भी फांसी की सजा को अंतिम नहीं माना जाता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धाराओं के अनुसार, इसे अमल में लाने से पहले उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि किया जाना अनिवार्य होता है।
जज रवि कुमार दिवाकर नवंबर 2025 से मुजफ्फरनगर में तैनात हैं। इससे पहले वह वर्ष 2022 में वाराणसी में सिविल जज के पद पर रहते हुए ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश देने के बाद चर्चा में आए थे।
इसके अलावा, मार्च 2024 में बरेली दंगों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई उनकी कुछ राजनीतिक टिप्पणियों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायिक मर्यादा के विपरीत मानते हुए रिकॉर्ड से हटा दिया था। उच्च न्यायालय ने तब स्पष्ट किया था कि न्यायिक अधिकारियों को व्यक्तिगत विचारों से बचते हुए संयमित भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
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