जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल से हटने के बाद चर्चा में रामलीला मैदान, जानिए इसका इतिहास
दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद ऐतिहासिक रामलीला मैदान एक बार फिर नए विकल्प के तौर पर केंद्र में आ गया है।

दिल्ली पुलिस ने इस सप्ताह जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफाई करने का फैसला किया है। इसके साथ ही प्रशासन ने राजधानी में धरने और सभाओं के लिए तीन नए स्थानों को निर्धारित किया है। इन तीनों विकल्पों में से सबसे नजदीकी स्थल रामलीला मैदान है, जिस पर अब सभी का ध्यान केंद्रित हो गया है।
सेंट्रल दिल्ली स्थित जंतर-मंतर लंबे समय से प्रमुख सामाजिक और नागरिक आंदोलनों का केंद्र रहा है। वर्ष 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध मुक्त करने के हाई कोर्ट के निर्णय को पलटा था, तब भी बड़ी संख्या में नागरिकों ने काले कपड़े पहनकर यहीं मोमबत्तियां जलाई थीं। ऐतिहासिक सौर वेधशाला के पास भूख हड़ताल और झंडों के साथ अपनी आवाज उठाने का लंबा दौर अब बदलाव की दहलीज पर है।
नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली के बीच स्थित रामलीला मैदान की कुल क्षमता 50,000 लोगों की है। इस मैदान के बनने से पहले यहां शाहजी का तालाब और शाहजी का बाग हुआ करता था। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने उस बाग को नष्ट कर दिया और तालाब को पाट दिया, जिस स्थान पर आज कमला मार्केट का क्लॉक टावर मौजूद है।
इतिहासकारों और पुरानी यादों के अनुसार, पहले सालाना रामलीला यमुना नदी के तट पर आयोजित की जाती थी। बाद में इस आयोजन को उजाड़े गए बाग वाली जगह पर स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके बाद से इस विस्तृत भूभाग का नाम रामलीला मैदान पड़ा। इस मैदान के ठीक सामने सड़क पार सिविक सेंटर की विशाल ग्रे इमारत खड़ी है।
मैदान की मुख्य पहचान यहां बना सफेद पैवेलियन है, जहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वर्ष 1961 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की यात्रा के लिए इसे तैयार करवाया था। औपचारिक आयोजनों का मंच रहा यह पैवेलियन अब शाम के समय लोगों के बैठने और समय बिताने का ठिकाना बन चुका है।
पुरानी दिल्ली के बुजुर्गों के अनुसार, दशकों पहले आसपास की तंग गलियों से आकर बच्चे यहां गिल्ली-डंडा और क्रिकेट खेलते थे। उस दौर में फारसी व्यापारी यहां हस्तनिर्मित औजार बेचते थे और दूधियों की भैंसें मैदान में चरती थीं। समय के साथ दूधिए ओखला चले गए, क्रिकेट मैच यमुना पार के मैदानों में होने लगे और औजार बेचने वाले व्यापारी भी आने बंद हो गए।
बदलावों के बावजूद यह मैदान आज भी हर साल रात के मेले और रामलीला का गवाह बनता है। मंच के पीछे अलग-अलग पेशों से जुड़े कलाकार अपने किरदारों में सजते हैं, तो वहीं मैदान के खुले कोनों में शहर के बेघर और बेरोजगार लोग भी सुस्ताते दिखाई देते हैं।
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