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रामलीला के मंच पर जमी दोस्ती, पर भोजन के खर्च के विवाद ने फिर बढ़ाई तल्खी; अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ और प्रधान ललित गर्ग के बीच छिड़ी मूक जंग!

- दशहरे के भोज पर राजनीति: क्या रामलीला कमेटी के खाते में जाता है खर्च ? - अनिल गुप्ता का तीखा पलटवार: "यह हमारी प्रतिष्ठा को धूमिल करने की गहरी साजिश है!" - प्रधान और कोषाध्यक्ष की सफाई: "कमेटी ने कभी एक रुपया भी नहीं दिया, खर्च परिवार का ही होता है" - सियासी जमीन और मूक जंग: चुनाव हार के बाद क्या फिर से सुलग उठी अशोक विहार की राजनीति?

Delhi Darpan Desk
Delhi Darpan Deskसमाचार डेस्क
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1 नवंबर 2026 · 1:14 pm147 व्यूज़अपडेटेड 1:17 pmwazirpur,Delhi
रामलीला के मंच पर जमी दोस्ती, पर भोजन के खर्च के विवाद ने फिर बढ़ाई तल्खी; अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ और प्रधान ललित गर्ग के बीच छिड़ी मूक जंग!
रामलीला के मंच पर जमी दोस्ती, पर भोजन के खर्च के विवाद ने फिर बढ़ाई तल्खी; अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ और प्रधान ललित गर्ग के बीच छिड़ी मूक जंग!

-दिल्ली दर्पण ब्यूरो

अशोक विहार रामलीला कमेटी के तत्वावधान में आयोजित होने वाले दशहरे के पावन पर्व पर एक नया और चौंकाने वाला विवाद सामने आया है। हर वर्ष दशहरे के दिन शोभायात्रा के प्रारंभ स्थल पर स्थित अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ के निवास पर आयोजित होने वाले भव्य प्रसाद और भोजन के खर्च को लेकर एक गंभीर चर्चा इन दिनों अशोक विहार की सामाजिक फिजाओं में तैर रही है। चर्चा यह थी कि इस भोज का खर्च रामलीला कमेटी के खाते में डाला जाता है। यह कानाफूसी पिछले दो-तीन वर्षों से हवा में थी, लेकिन इस वर्ष जब यह बात खुद अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ और उनके परिवार तक पहुँची, तो मानो घमासान मच गया। अपने कानों से इस तरह की बातें सुनने के बाद रामलीला के वर्तमान प्रधान ललित गर्ग और सोसाइटी के पूर्व प्रधान अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ के बीच एक बार फिर गहरी मूक जंग छिड़ गई है। हालात यह हैं कि दशहरे के बाद से दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह से बंद है।

अनिल गुप्ता का तीखा हमला और खुला चैलेंज :-

अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ का आरोप है कि रामलीला के प्रधान ललित गर्ग ने खुद उनके परिवार के किसी सदस्य से यह बात कही थी कि उनके निवास पर हर वर्ष होने वाले भोजन का खर्च रामलीला कमेटी वहन करती है। इस बात को सुनते ही घी वाले के परिवार का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। जब दिल्ली दर्पण टीवी ने इस पूरे मामले पर अनिल गुप्ता से पक्ष जाना, तो उन्होंने इन तमाम चर्चाओं को सिरे से खारिज करते हुए एक खुला चैलेंज दिया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके आवास पर होने वाले इस पारंपरिक भोजन का खर्च पूरी तरह से उनका परिवार खुद उठाता है। अनिल गुप्ता का कहना है कि वे न केवल रामलीला कमेटी में अपना व्यक्तिगत आर्थिक योगदान देते हैं, बल्कि अपने संपर्कों के जरिए भारी-भरकम दान भी एकत्रित करते हैं। इसके अलावा, शोभायात्रा में शामिल होने वाले प्रमुख अतिथियों, साधु-संतों और कमेटी से जुड़े लोगों के लिए प्रसाद की व्यवस्था वे अपने निजी संसाधनों से करते हैं। उनका साफ आरोप है कि इस तरह की मनगढ़ंत बातें उनकी और उनके परिवार की सामाजिक छवि को धूमिल करने के किसी गहरी साजिश का हिस्सा हैं।

प्रधान ललित गर्ग और कोषाध्यक्ष का पक्ष :-

जब इस गंभीर आरोप पर दिल्ली दर्पण टीवी ने रामलीला कमेटी के प्रधान ललित गर्ग से बात की, तो उन्होंने साफ शब्दों में इन सभी बातों से इंकार किया। ललित गर्ग का कहना है कि उन्होंने कभी भी, किसी से भी ऐसी कोई चर्चा नहीं की है कि इस भोजन का खर्च कमेटी उठाती है। उन्होंने भी इस बात की पुष्टि की कि इस प्रसाद और भोजन का पूरा खर्च अनिल गुप्ता का परिवार ही वहन करता है।

इस विवाद की सच्चाई जानने के लिए जब कमेटी के कोषाध्यक्ष प्रमोद कोहली से संपर्क किया गया, तो उन्होंने भी दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। दशकों से कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रमोद कोहली ने स्पष्ट किया कि, "ऐसा कभी इतिहास में नहीं हुआ कि अनिल गुप्ता ने अपने निवास पर होने वाले भोजन का खर्च रामलीला कमेटी पर डाला हो। अनिल गुप्ता का रामलीला के सफल संचालन में हमेशा से एक बहुत बड़ा और सराहनीय योगदान रहा है।

" सियासत के नए पन्ने और अंदरूनी मनभेद :-

प्रधान, कोषाध्यक्ष और खुद अनिल गुप्ता—तीनों पक्षों के बयानों से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि यह खर्च कभी कमेटी के खाते से नहीं हुआ। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर पिछले कुछ वर्षों से इस तरह की भ्रामक चर्चाएँ कौन और क्यों फैला रहा है? क्या यह अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ की साफ-सुथरी छवि को नुकसान पहुँचाने का कोई सुनियोजित प्रयास है?

गौरतलब है कि कई वर्षों तक अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ और ललित गर्ग इस रामलीला के सर्वेसर्वा रहे हैं। दोनों की मजबूत जुगलबंदी ने न केवल रामलीला का ऐतिहासिक मंचन किया, बल्कि पूरे अशोक विहार को एक सूत्र में पिरोकर रखा। हालांकि, इन दोनों के बीच समय-समय पर स्थानीय सोसाइटी की सियासत आड़े आती रही है। अभी हाल ही में हुए अग्रवाल वेलफेयर सोसाइटी के चुनावों में जब ललित गर्ग ने खुलकर अनिल गुप्ता के पैनल का विरोध किया, तो उनके गुट का सूपड़ा साफ हो गया था। चुनाव के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि इसका असर रामलीला पर पड़ेगा, लेकिन दोनों ने परिपक्वता दिखाते हुए रामलीला के दौरान अपने मतभेदों को सार्वजनिक नहीं होने दिया और एक मंच पर नजर आए। लेकिन रामलीला और दशहरा समाप्त होते ही भोजन के खर्च से जुड़ी इन पुरानी चर्चाओं ने आग में घी का काम किया और दोनों के बीच फिर से गहरे मनभेद पैदा कर दिए।

बड़ा सवाल: आखिर इस दुष्प्रचार के पीछे कौन ?

फिलहाल दोनों दिग्गजों के बीच संवादहीनता बनी हुई है, लेकिन दिल्ली दर्पण टीवी की पड़ताल से यह साफ हो गया है कि अनिल गुप्ता ‘घी वाले’ की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के लिए दुर्भावनापूर्ण प्रयास किए गए हैं। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सोसाइटी चुनाव की तरह ही अनिल गुप्ता को किसी राजनीतिक या सामाजिक दुष्प्रचार का शिकार बनाया जा रहा है? क्या इतने बड़े और सम्मानित आयोजनों से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों के खिलाफ ऐसी झूठी बातें फैलाना समाज के हित में है?

इन तमाम अनसुलझे सवालों के बीच अशोक विहार की फिजाओं में यह चर्चा गर्म है कि आखिर इस मूक जंग का अगला अध्याय क्या होगा।

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