" अशोक विहार रामलीला के मंच पर सांसद से सीधा सवाल: बंगाल में दुर्गा पूजा पर छुट्टियाँ, तो दिल्ली में रामलीला पर क्यों नहीं ?"
-रामलीला के मंच पर सांसद प्रवीण खंडेलवाल से सार्वजनिक वादा, अब सोशल मीडिया पर लोगों से याद दिलाने की अपील**

-राजेंद्र स्वामी , दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली। अशोक विहार रामलीला के मंच पर उस समय एक ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला, जिसने मौजूद हजारों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। चांदनी चौक से सांसद प्रवीण खंडेलवाल स्वागत और अपना संदेश देने मंच पर पहुंचे थे, लेकिन भाषण शुरू होने से पहले ही रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों ने उनके सामने एक ऐसी मांग रख दी, जिसका जवाब देना उनके लिए आसान नहीं था।
रामलीला कमेटी के एडिशनल चेयरमैन अनिल गुप्ता 'घी वाले' ने सांसद को संबोधित करते हुए कहा कि देश और दिल्ली में सनातन हितैषी सरकार होने के बावजूद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बच्चों को रामलीला देखने का अवसर कौन देगा?
उन्होंने कहा कि पहले दशहरे के दौरान बच्चों की स्कूलों में छुट्टियाँ होती थीं। परिवार अपने बच्चों के साथ रामलीला देखने आते थे, जिससे नई पीढ़ी भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और संस्कृति से जुड़ती थी। लेकिन अब स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। बच्चों को स्कूल जाना पड़ता है, परीक्षाओं की तैयारी करनी होती है और अभिभावक भी इसी चिंता में रहते हैं। ऐसे में हर दिन रामलीला देखने आना अधिकांश परिवारों के लिए संभव ही नहीं रह जाता।
अनिल गुप्ता ने सांसद से मंच से ही मांग रखी कि भारत सरकार और दिल्ली सरकार मिलकर दशहरे और रामलीला के दौरान कम से कम दस दिनों की स्कूल छुट्टियाँ घोषित करें, ठीक उसी तरह जैसे पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान लंबे अवकाश दिए जाते हैं। उन्होंने सुझाव भी दिया कि पढ़ाई की भरपाई अतिरिक्त कक्षाओं या दूसरे शैक्षणिक प्रबंधों के माध्यम से की जा सकती है, लेकिन बच्चों को भारतीय संस्कृति और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है।
जब सांसद असहज हुए... मंच पर मौजूद लोगों के अनुसार जब अनिल गुप्ता ने बार-बार इस विषय पर सार्वजनिक वादा करने का आग्रह किया तो सांसद प्रवीण खंडेलवाल कुछ क्षणों के लिए असहज दिखाई दिए। उन्होंने पहले "जय श्रीराम" का उद्घोष कर बात समाप्त करने की कोशिश की, लेकिन रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों ने उनसे स्पष्ट आश्वासन देने का आग्रह जारी रखा।
आखिरकार सांसद को मंच से सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि वे इस विषय पर दिल्ली सरकार से बातचीत करेंगे और इस मांग को आगे बढ़ाएंगे।
प्रधान ललित गर्ग ने लोगों से की खास अपील मामला यहीं नहीं रुका। इसके बाद अशोक विहार रामलीला कमेटी के प्रधान ललित गर्ग ने मंच संभालते हुए कहा कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने उपस्थित लोगों और समाज से अपील की कि सांसद को सोशल मीडिया और संदेशों के माध्यम से लगातार उनका वादा याद दिलाते रहें ताकि यह मांग केवल मंच तक सीमित न रह जाए।

ललित गर्ग ने कहा,
**"अगर हमारे बच्चे ही रामलीला नहीं देख पाएंगे, तो फिर रामलीला करने का उद्देश्य क्या रह जाएगा? बच्चों में संस्कार तभी आएंगे जब वे भगवान श्रीराम के जीवन को मंच पर देखेंगे, समझेंगे और उससे प्रेरणा लेंगे।"
उन्होंने कहा कि स्कूलों की छुट्टियाँ केवल आराम के लिए नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और नैतिक मूल्यों से बच्चों को जोड़ने का भी माध्यम होनी चाहिए।**
क्या यह मांग गलत है? आज लगभग हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा मोबाइल और इंटरनेट से निकलकर भारतीय संस्कृति को भी जाने। लेकिन वास्तविकता यह है कि जब शाम को रामलीला होती है, तब तक बच्चों के अगले दिन स्कूल, होमवर्क और परीक्षाओं की चिंता शुरू हो जाती है। कई परिवार चाहकर भी बच्चों को रोज रामलीला नहीं दिखा पाते। यही सवाल अब सार्वजनिक बहस का विषय बन रहा है—

अगर दुर्गा पूजा जैसे बड़े पर्वों पर कई राज्यों में लंबी छुट्टियाँ हो सकती हैं, तो क्या भगवान श्रीराम की रामलीला के दौरान बच्चों को सांस्कृतिक शिक्षा देने के लिए कुछ दिनों का विशेष अवकाश नहीं मिलना चाहिए?
अब सोशल मीडिया पर शुरू होगी मुहिम? रामलीला कमेटी का कहना है कि यह किसी राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों का विषय है। कमेटी ने लोगों से अपील की है कि वे सोशल मीडिया के माध्यम से सांसद प्रवीण खंडेलवाल को उनका सार्वजनिक वादा याद दिलाते रहें, ताकि यह मांग सरकार तक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।
अब देखना होगा कि यह पहल केवल मंच तक सीमित रहती है या आने वाले समय में बच्चों के लिए रामलीला के दौरान विशेष स्कूल अवकाश पर गंभीर चर्चा शुरू होती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या हमारे बच्चों को भगवान श्रीराम के आदर्शों से जोड़ने के लिए रामलीला के दौरान विशेष स्कूल छुट्टियाँ होनी चाहिए ?
लेखक




टिप्पणियाँ
0