सुंदरनगर में पांच दिवसीय संतमत सत्संग एवं आनंद-योग शिविर सम्पन्न, ध्यान-साधना और आत्मिक जागरण का बना केंद्र

सुंदरनगर में संतमत सत्संग शिविर का दृश्य।

मंडी/सुंदरनगर।
हिमाचल प्रदेश की मनोहारी वादियों के बीच स्थित सुंदरनगर के शीतला माता मंदिर परिसर में अखिल भारतीय संतमत सत्संग, दिल्ली द्वारा 18 से 22 जून तक आयोजित पांच दिवसीय संतमत सत्संग एवं आनंद-योग साधना शिविर आध्यात्मिक चेतना, भक्ति और आत्मिक जागरण का एक भव्य केंद्र बन गया। शिविर में हिमाचल प्रदेश सहित देश के विभिन्न भागों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भाग लिया और ध्यान, सत्संग तथा भजन के माध्यम से आत्मिक शांति एवं आनंद का अनुभव किया।
शिविर का शुभारंभ 18 जून को परम पूज्य सद्गुरुदेव परम संत महात्मा डॉ. सुरेश जी महाराज एवं गुरुमाता परम संत डॉ. ममता जी के आगमन के साथ हुआ। दीप प्रज्वलन एवं स्वागत समारोह के दौरान स्थानीय सत्संगी परिवारों ने पुष्पहार और शॉल भेंट कर संतों का अभिनंदन किया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और भक्तिमय भजनों ने वातावरण को श्रद्धा और भक्ति से ओत-प्रोत कर दिया।

अपने प्रारंभिक संदेश में सद्गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य जिस आनंद और शांति की तलाश बाहरी संसार में करता है, उसका वास्तविक स्रोत उसके अपने भीतर है। उन्होंने साधकों को नियमित आनंद-योग ध्यान साधना तथा संतमत साहित्य के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।
19 जून को जालपा माता मंदिर परिसर में आयोजित विशेष कार्यक्रम शिविर का प्रमुख आकर्षण रहा। प्राकृतिक सौंदर्य और भक्ति के वातावरण के बीच आयोजित इस सत्र में सद्गुरुदेव ने ध्यान-साधना के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्षों की व्याख्या करते हुए कहा कि मन को वास्तविक विश्राम ध्यान द्वारा ही प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि विचारों से मुक्त होकर जब मन आत्मा में केंद्रित होता है तो साधक असीम शांति और ऊर्जा का अनुभव करता है।
उसी दिन जयदेवी में आयोजित सायंकालीन सत्संग में बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस अवसर पर सद्गुरुदेव ने साधना, अभ्यास, मन की एकाग्रता तथा साकार एवं निराकार उपासना की अवधारणाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सत्संग केवल धार्मिक या आध्यात्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को समझने और उसे बेहतर बनाने की प्रक्रिया है।
20 एवं 21 जून के विभिन्न सत्रों में साधना की क्रमिक अवस्थाओं, ईश्वरीय कृपा, निज कृपा, अभ्यास, वैराग्य और सहज समाधि जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। सद्गुरुदेव ने कहा कि आध्यात्मिक उन्नति का आधार निरंतर अभ्यास है और साधक को अनुकूल ही नहीं बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी साधना जारी रखनी चाहिए। उन्होंने सत्संग में नियमित सहभागिता को साधना की सफलता के लिए आवश्यक बताया।
शिविर के दौरान भजन गायन, ध्यान-अभ्यास, प्रश्नोत्तर सत्र, सामूहिक शांतिपाठ तथा नामदान कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। श्रद्धालुओं ने इन पांच दिनों को आत्मिक ऊर्जा, प्रेरणा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का अनुपम अवसर बताया।
समापन दिवस पर श्रद्धालुओं की संख्या सैकड़ों में रही। कई नए जिज्ञासुओं ने नामदान ग्रहण कर अखिल भारतीय संतमत सत्संग की आध्यात्मिक परंपरा से स्वयं को जोड़ा। आयोजन के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने इसे जीवन को नई दिशा देने वाला अनुभव बताया।
पांच दिवसीय यह शिविर हिमाचल प्रदेश में संतमत की आध्यात्मिक परंपरा के विस्तार, ध्यान-साधना के प्रचार तथा मानवीय मूल्यों के प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुआ। पूरे आयोजन में एक ही संदेश बार-बार प्रतिध्वनित होता रहा— “परमात्मा तू ही है, तेरी इच्छा पूर्ण हो।”

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