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Journalism : राष्ट्रीय मीडिया पर हावी यूटूबर

सत्ता के लिए काम करने लगा देश का मीडिया ?

सी.एस. राजपूत 

मीडिया पर उंगली तो कांग्रेस के राज में ही उठनी शुरू हो गई थी पर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो मीडिया जैसे सरकार का भोंपू बनकर रह गया हो। मतलब जो पत्रकार सत्तापक्ष की नीति को अपना ले रहा है वह तो आज के मीडिया में फिट बैठ जा रहा है नहीं तो जो भी पत्रकार सरकार की नीतियों की थोड़ी सी भी आलोचना कर दे उसका मीडिया हाउस में काम करना मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि कितने स्वाभिमानी मीडियाकर्मियों को या तो नौकरी से निकाल दिया या फिर उन्होंने खुद ही नौकरी छोड़ दी है। 

देश में इस समय मीडिया दो भागों में बांटकर रह गया है एक जो सरकार की चाटुकारिता में लगा है तो दूसरा सरकार की नीतियों पर उंगली उठाकर उसकी आलोचना कर रहा है। इन दोनों मीडिया के बीच डिजीटल मीडिया के रूप में एक वैकल्पिक मीडिया खड़ा हो रहा है जो लगातार लोकप्रियता बटोर रहा है। जमकर सरकारों की धज्जियां उड़ा रहा है। यह मीडिया बगावती पत्रकारों का है। डिजिटल पत्रकारिता के लिए यह गौरव की बात है कि इस बार कुलदीप नैयर पुरस्कार यूटूबर अजीत अंजुम को मिल रहा है। यह डिजिटल मीडिया की ही ताकत थी कि किसान आंदोलन के सामने मोदी सरकार को झुकना पड़ा। इसमें दो राय नहीं है कि द वॉयर, द प्रिंट, लल्लन टॉप और जनचौक जैसे वेब पोर्टल जो स्टोरी देते हैं वह स्टोरी राष्ट्रीय मीडिया नहीं दे पा रहा है। 

चाहे प्रसून वाजपेयी हों, अभिसार शर्मा हो, अजीत अंजुम हों, सौरभ द्विवेदी हो, नवीन कुमार हो, श्याम मीरा सिंह हो या फिर दूसरे यूट्यूबर सभी ने सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ पूरी तरह से मोर्चा संभाल रखा है। इन सब परिस्थितियों में काफी लोग यह कहते सुने जाते हैं कि आज की पत्रकारिता नौकरी है। हम लोग पत्रकारिता नहीं बल्कि नौकरी कर रहे हैं। कई लोग जमीनी पत्रकारिता करने के चक्कर में परिवारों के प्रभावित होने का अंदेशा जताते हैं। 

ये लोग यह समझने को तैयार नहीं कि भले ही आज की तारीख में काले कारनामों को छिपाने के लिए मीडिया हाउस बनाये जा रहे हैं, भले ही आज का मीडिया धंधा बनकर रह गया है फिर भी बीच का रास्ता निकालकर पत्रकारिता की जा सकती है। यह भी कह सकते हैं कि मीडिया पर ही देश और समाज की सोच टिकी है। चाहे राजनीति हो, समाज सेवा हो या चौपाल या फिर घरों में होने वाली चर्चा सभी मीडिया का उदाहरण देते हुए ही तो की जाती है।

मतलब यदि मीडिया सही से अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहा है तो उससे न केवल देश बल्कि समाज भी प्रभावित होता है। मीडिया हाउस के मालिकान पत्रकारों का इस्तेमाल अपने काले कारनामे छिपाने या फिर सरकार से सेटिंग के लिए करते हैं। जमीनी हकीकत यह है कि  चाटुकारिता और दलाली करने वाले पत्रकारों से पत्रकारिता की तो उम्मीद नहीं की जा सकती है और जो पत्रकारिता करने के लिए इस पेशे में आये हैं, वे चाटुकारिता और दलाली नहीं कर सकते हैं। यह देश में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि कौन से पत्रकार दलाली और चाटुकारिता कर रहे हैं और कौन से पत्रकार पत्रकारिता।

गत दिनों जब मोरबी पुल हादसा हुआ तो आजकल आज तक में काम कर रहे सुधीर चौधरी ने पुल गिरने के लिए लोगों को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। क्या यह पत्रकारिता है ? क्या पीएम मोदी को खुश करने के लिए तैयार की गई स्टोरी नहीं थी ? वैसे भी सुधीर चौधरी के जी न्यूज के छोड़ने के पीछे भी सुभाष चंद्रा के राजस्थान से राज्य सभा चुनाव हारने के बाद बीजेपी के खिलाफ अभियान शुरू करना माना गया। क्या आज की तारीख में रजत शर्मा, अंजना ओम कश्यप, श्वेता सिंह और अमिश देवगन की पत्रकारिता देश और समाज के लिए हो रही है। 

दरअसल देश की मीडिया का जन्म आजादी की लड़ाई की कोख से माना जाता है।  आजादी की लड़ाई में पत्रकार और लेखक दिन में आजादी की लड़ाई लड़ते थे और रात में अखबार निकालते थे। गणेश शंकर विद्यार्थी देश का सबसे बड़ा उदाहरण है। गणेश शंकर विद्यार्थी प्रताप नाम से एक अखबार निकालते थे। इस अखबार से जुड़कर देश के क्रांतिकारी उस दौर की पत्रकारिता कर रहे थे। बताया जाता है कि राम प्रसाद बिस्मिल और भगत सिंह ने भी गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप अखबार में संपादन किया। देश में गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार भी पत्रकारिता का सबसे बड़ा पुरस्कार माना जाता है। कुलदीप नैयर भी देश में बड़ा उदाहरण है। इमरजेंसी में कुलदीप नैयर को बहुत सी यातनाएं दी गईं। जो लोग राजनीति और पत्रकारिता को अलग-अलग रूप में देखते हैं।  उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि पत्रकारिता और राजनीति अलग-अलग नहीं हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी कांग्रेस के नेता भी थे तो पत्रकार भी। आजादी के समय तो अधिकतर नेता पत्रकार और लेखक भी थे। चाहे महात्मा गांधी हों, पंडित जवाहर लाल नेहरू हों, डॉ. राम मनोहर लोहिया हों, आचार्य नरेंद्र देव हों सभी के लेख विभिन्न अख़बारों में प्रकाशित होते रहते थे। पंडित नेहरू तो नेशनल हेरोल्ड को भी देखते थे। ऐसे ही अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मनोहर सिंह और प्रमोद महाजन भी पत्रकार थे।

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