शिक्षकों से अनिवार्य चुनाव ड्यूटी कराने पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकारी शिक्षकों से मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम जबरन कराने के बजाय ऐच्छिक होना चाहिए।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजधानी में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए सरकारी स्कूल के शिक्षकों को अनिवार्य रूप से बीएलओ और गणना कर्मचारी बनाने पर निर्वाचन आयोग (ईसीआई) से सवाल पूछे हैं। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि शिक्षकों से इस प्रकार के चुनावी कार्य जबरन कराने के बजाय ऐच्छिक होने चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी स्कूल के शिक्षक निर्वाचन आयोग के कर्मचारी नहीं हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि भले ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 13बी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को कर्मचारियों की तैनाती का अधिकार देती है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश शिक्षकों को चुनाव संबंधी कर्तव्यों के लिए बाध्य करने पर सीमाएं तय करते हैं।
अदालत ने आयोग के 14 जुलाई के नोटिस का हवाला देते हुए पूछा कि यदि कर्मचारियों को स्वयंसेवक कहा जा रहा है, तो काम को अनिवार्य कैसे बनाया जा सकता है। पीठ ने कहा कि छुट्टियों के दिन काम करने के बाद कर्मचारियों को आराम की जरूरत होती है। अदालत ने आयोग से पूछा कि क्या अनुच्छेद 324 की आड़ में ऐसा किया जा सकता है, जबकि आदेश न मानने पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
यह याचिका अधिवक्ता राजेश गोगना और अशोक अग्रवाल द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आंबेडकर नगर के सरकारी शिक्षकों को एसआईआर ड्यूटी में लगाने के 14 जुलाई के आदेश को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया कि पढ़ाई के घंटों के दौरान स्कूलों से शिक्षकों को हटाने से कक्षाएं अतिथि शिक्षकों या अन्य विषयों के शिक्षकों को संभालनी पड़ रही हैं, जिससे छात्रों की शिक्षा प्रभावित हो रही है।
निर्वाचन आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए अदालत में दलील दी कि शिक्षकों को स्कूल के घंटों के बाद और छुट्टियों में ही बीएलओ की जिम्मेदारी दी जा रही है। आयोग ने बताया कि इसके लिए उन्हें मुआवजा और मानदेय दिया जाता है तथा जहां स्कूलों ने कठिनाई जताई, वहां उदार रुख अपनाया गया है।
आयोग ने अदालत को यह भी बताया कि बीएलओ का काम सिर्फ शिक्षकों से नहीं, बल्कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), नगर निगम (एमसीडी) और अन्य विभागों के कर्मचारियों से भी कराया जा रहा है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने निर्वाचन आयोग को अपना रुख स्पष्ट करते हुए हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई तय की।
लेखक



टिप्पणियाँ
3आगे क्या होगा वाला हिस्सा वही है जिसे सब छोड़ेंगे और सबको पढ़ना चाहिए।
आख़िरकार, ऐसी कवरेज जो पाठक की समझ का सम्मान करती है। धन्यवाद।
क्षेत्रीय असर पर थोड़ा और होता तो अच्छा था, पर कुल मिलाकर मज़बूत लेख।