महंगी लागत और चार्जिंग की कमी बनी इलेक्ट्रिक स्कूल बसों की राह में रोड़ा, विशेषज्ञों ने जताई चिंता
इंडिया क्लीन ट्रांसपोर्टेशन समिट में विशेषज्ञों ने कहा कि बच्चों को प्रदूषण से बचाने के लिए ई-बसें जरूरी हैं, लेकिन ऊंची लागत और बुनियादी ढांचे की कमी बड़ी बाधा हैं।

देश में स्कूली परिवहन को इलेक्ट्रिक वाहनों में तब्दील करने से बच्चों को सड़क पर होने वाले हानिकारक उत्सर्जन से बचाया जा सकता है, लेकिन इस राह में ऊंची लागत, चार्जिंग सुविधाओं की कमी और वित्तीय बाधाएं सबसे बड़ा अवरोध बनी हुई हैं। नई दिल्ली में आयोजित 'इंडिया क्लीन ट्रांसपोर्टेशन समिट (आईसीटीएस) 2026' के दौरान उद्योग जगत और नीति विशेषज्ञों ने यह चिंता जाहिर की। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक विशेष रूप से स्कूल बसों के अनुकूल मॉडल और आसान वित्तीय विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक इसका बड़े पैमाने पर विस्तार मुश्किल है।
बस एंड कार ऑपरेटर्स कन्फेडरेशन ऑफ इंडिया (बीओसीआई) के संयुक्त सचिव गुरमीत सिंह तनेजा ने सम्मेलन में कहा कि स्कूली परिवहन मूल रूप से एक सामाजिक सेवा है, जिसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित पहुंचाना है। उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था को इलेक्ट्रिक में बदलने से पर्यावरण को लाभ जरूर होगा, लेकिन भारी लागत अब भी सबसे बड़ी अड़चन है। इसके साथ ही चार्जिंग में लगने वाला समय, वर्कशॉप की सीमित सुविधाएं और मोटर वाहन नियमों में जरूरी बदलाव न होना भी बड़े मुद्दे हैं।
पीएमआई इलेक्ट्रो मोबिलिटी सॉल्यूशंस के मुख्य परिचालन अधिकारी सीके गोयल ने बताया कि उत्पादन क्षमता तो मौजूद है, लेकिन स्कूल अतिरिक्त प्रीमियम चुकाने से कतराते हैं। उन्होंने दिल्ली सरकार के उस प्रस्ताव का स्वागत किया, जिसके तहत निजी बसों को सरकारी चार्जिंग स्टेशनों और रियायती बिजली के इस्तेमाल की अनुमति देने की बात कही गई है। गोयल के अनुसार, डीटीसी डिपो में मामूली शुल्क देकर बसें सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद दिन के समय चार्ज हो सकती हैं और दोपहर की छुट्टी से पहले वापस पहुंच सकती हैं।
स्विच मोबिलिटी के योजना एवं रणनीति प्रमुख विनोद कुमार आर ने आगाह किया कि सामान्य इलेक्ट्रिक बसों को स्कूली उपयोग में लाने से बड़ी बैटरी का अनावश्यक खर्च बढ़ सकता है। वहीं, विश्व बैंक के वरिष्ठ परिवहन विशेषज्ञ डॉ. लघु पाराशर ने कहा कि स्कूल बसें रोजाना औसतन सिर्फ 50 से 60 किलोमीटर चलती हैं और दिन में काफी समय खड़ी रहती हैं, जिससे इनके विद्युतीकरण की संभावनाएं बेहतर हैं। इसके अलावा कई स्कूलों के पास अपने परिसर में चार्जिंग ढांचा लगाने के लिए पर्याप्त जमीन भी उपलब्ध होती है।
डॉ. पाराशर ने सुझाव दिया कि निजी ऑपरेटरों के लिए लंबे समय के ऋण, कम डाउन पेमेंट और लीजिंग मॉडल तैयार किए जाने चाहिए ताकि मासिक नकदी प्रवाह पर असर न पड़े। गौरतलब है कि दिल्ली की इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति 2026 के तहत स्कूलों के लिए चरणबद्ध लक्ष्य तय किए गए हैं। इसके तहत नीति लागू होने के दो साल के भीतर कुल स्कूल बस बेड़े का 10 प्रतिशत, तीन साल में 20 प्रतिशत और 31 मार्च 2030 तक 30 प्रतिशत हिस्सा इलेक्ट्रिक करना अनिवार्य किया गया है।
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