कम्युनिटी पुलिसिंग या 'लाइजनिंग' का लाइसेंस? रक्षाबंधन के वचन और दिल्ली पुलिस की 'राजनैतिक' कमेटियों की कड़वी हकीकत -
-'अमन' और 'सुरक्षा' के नाम पर राजनैतिक अखाड़ा बनी थाना और जिला कमेटियां - अपराधियों की चांदी: पुलिस वेरिफिकेशन की उड़ रही है धज्जियां - रक्षाबंधन पर व्यवस्था से 4 सीधे सवाल

- राजेंद्र स्वामी , दिल्ली दर्पण
नई दिल्ली: आज रक्षाबंधन है—एक बहन का अपने भाई की कलाई पर रेशम की डोर बांधकर सुरक्षा का 'वचन' लेने का त्योहार। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में किसी महिला, बुजुर्ग या आम नागरिक की सुरक्षा केवल उसके परिवार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकता। सड़क पर निकलती बहन हो या स्कूल से लौटता मासूम, असली सुरक्षा की जिम्मेदारी उस व्यवस्था पर है जिसके कंधों पर कानून का 'स्टार' लगा है—यानी दिल्ली पुलिस। पुलिस और जनता के बीच इसी सुरक्षा और विश्वास के रिश्ते को मजबूत करने के लिए एक व्यवस्था बनाई गई—'कम्युनिटी पुलिसिंग'। थाना स्तरीय समिति (Thana Level Committee - TLC) और जिला स्तरीय समिति (District Level Committee - DLC)। कागजों में यह ढांचा बेहद मजबूत दिखता है, जहां जनता और पुलिस आमने-सामने बैठकर इलाके की समस्याओं, अतिक्रमण, महिला सुरक्षा और अपराधों पर चर्चा करती हैं।
लेकिन आज रक्षाबंधन के इस मौके पर Delhi Darpan TV एक तीखा और बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है: "क्या रक्षा का वचन देने वाली ये कमेटियां आज जनता का सुरक्षा कवच हैं, या फिर राजनेताओं और पुलिस के बीच 'सुलभ लाइजनिंग' और दलाली का लाइसेंस बन चुकी हैं?"
'अमन' और 'सुरक्षा' के नाम पर राजनैतिक अखाड़ा गृह मंत्रालय (MHA) और दिल्ली पुलिस मुख्यालय की कम्युनिटी पुलिसिंग गाइडलाइन्स साफ कहती हैं कि इन कमेटियों का ढांचा पूरी तरह गैर-राजनीतिक होना चाहिए। इसमें निष्पक्ष नागरिकों, RWA प्रतिनिधियों, डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों और निस्वार्थ समाजसेवियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
लेकिन धरातल की हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। खासकर नॉर्थ वेस्ट जिले (North West District) की पुलिस कमेटियों की सूची को देखकर तो यही लगता है कि नियमों को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया है।

नेताओं की खुशामद: सांसद और विधायक अपने उन कार्यकर्ताओं और करीबियों के नाम इन कमेटियों में भिजवाते हैं जिन्हें उन्हें 'राजनीतिक रूप से एडजस्ट' करना होता है।
पुलिस की बेफिक्री: स्थानीय SHO और जिले के DCP अपनी पोस्टिंग और राजनैतिक दबाव के चलते बिना किसी सवाल-जवाब के इन सिफारिशों पर आंख बंद करके मुहर लगा देते हैं।
परिणाम यह है कि जिन्हें समाज में कानून-व्यवस्था सुधारने के लिए पुलिस की 'आंख और कान' बनना था, वे थानों में बैठकर 'बिचौलिए' बन गए हैं। वे आम जनता की समस्या उठाने नहीं, बल्कि थानों में मुकदमों की सेटिंग, अवैध कब्जों की लाइजनिंग और अपना राजनैतिक रसूख चमकाने आते हैं।
अपराधियों की चांदी: पुलिस वेरिफिकेशन की उड़ती धज्जियां सबसे संगीन और खतरनाक सवाल उठते हैं कमेटियों में सदस्यों के पुलिस वेरिफिकेशन (Character Verification) पर!
आधिकारिक नियमों के अनुसार, समिति के हर सदस्य का ट्रैक रिकॉर्ड बेदाग होना चाहिए और उस पर कोई आपराधिक मामला नहीं होना चाहिए। लेकिन दिल्ली की कई थाना कमेटियों की कड़वी सच्चाई यह है कि वहां भू-माफिया, रंगदारी और आपराधिक छवि वाले लोग साहब की कुर्सी के ठीक बगल में विराजमान दिखते हैं।
क्या SHO को उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं होती?
क्या DCP कार्यालय की लोकल इंटेलिजेंस (LIU) और विजिलेंस विंग सो रही है?
जिस अपराधी पर पुलिस की पैनी नजर होनी चाहिए थी, वही अपराधी पुलिस का 'सलाहकार' बनकर थाने में चाय पी रहा है। जब किसी थाने में इलाके का नामी दबंग पुलिस की कमेटी में बैठा दिखेगा, तो क्या कोई साधारण महिला या पीड़ित नागरिक उस थाने में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत कर पाएगा?
रक्षाबंधन पर व्यवस्था से 4 सीधे सवाल आज रक्षा के इस पर्व पर Delhi Darpan TV शासन, प्रशासन और पुलिस कप्तान से सीधे सवाल पूछता है:
गृह मंत्रालय से सवाल: जब MHA की गाइडलाइन्स में कमेटियों को गैर-राजनीतिक रखने का स्पष्ट आदेश है, तो दिल्ली पुलिस में यह 'राजनीतिक कोटा' किसकी मेहरबानी से चल रहा है?
पुलिस आयुक्त से सवाल: क्या आपकी पुलिस के पास इतनी निष्पक्षता नहीं बची कि वे किसी विधायक या सांसद द्वारा भिजवाई गई विवादित या आपराधिक पृष्ठभूमि की सूची को खारिज कर सकें?
पारदर्शिता पर सवाल: क्या दिल्ली पुलिस थाना और जिला कमेटियों के सभी सदस्यों की सूची, उनके पद और उनके पुलिस सत्यापन (Verification Status) को सार्वजनिक (Public Domain) करेगी?
जवाबदेही पर सवाल: अगर किसी कमेटी का सदस्य थानों में दलाली या लाइजनिंग करता पाया जाता है, तो उस पर सिफारिश करने वाले जनप्रतिनिधि और आंखें मूंदने वाले SHO पर क्या कार्रवाई होगी?
निष्पक्षता की दरकार रक्षाबंधन हमें सिर्फ एक रिश्ते की नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी की याद दिलाता है। दिल्ली की लाखों बहनों और नागरिकों को सुरक्षा के लिए किसी 'राजनैतिक आका' या 'थानों के बिचौलिए' की बैसाखी नहीं चाहिए। लोकतंत्र में सुरक्षा किसी नेता या पुलिस अफसर की 'मेहरबानी' नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक 'अधिकार' है।
यदि कम्युनिटी पुलिसिंग को सच में जिंदा रखना है, तो इन कमेटियों से राजनैतिक रसूखदारों और आपराधिक छवि के लोगों को बाहर का रास्ता दिखाना होगा। RWA, वकीलों, डॉक्टरों, पत्रकारों और वास्तविक समाजसेवियों को उनका हक देना होगा। जब तक यह सफाई नहीं होगी, तब तक कम्युनिटी पुलिसिंग सिर्फ चाय-नाश्ते की मीटिंग, फोटो खिंचवाने का जरिया और कागजी खानापूर्ति ही बनी रहेगी।
लेखक




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