दिल्ली बीजेपी में ये हो क्या रहा है? पार्षदों की पिटाई से लेकर दलित मंडल अध्यक्ष को बंधक बनाने तक, अंदरूनी कलह ने खोली 'संस्कारी' पार्टी के दावों की पोल
-मुंडका से वज़ीरपुर तक: मारपीट और दलित उत्पीड़न के मामलों से सहमी पार्टी -सांसदों की शह और बेबस नेतृत्व: क्या कागजी बनकर रह गई है अनुशासन समिति?

-राजेंद्र स्वामी , दिल्ली दर्पण ब्यूरो
दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर लगता है सब कुछ रसातल में जाता दिख रहा है। दिल्ली में पार्टी के भीतर मची आपसी खींचतान ,अब वैचारिक मतभेदों से आगे निकलकर सीधे मारपीट, थप्पड़कांड और दलित उत्पीड़न तक पहुंच चुकी है। आलम यह है कि कहीं विधायक पार्षदों को पीट रहे हैं, तो कहीं मंडल अध्यक्षों और कार्यकर्ताओं के साथ खूनखराबे जैसी नौबत आ रही है। अनुशासन और संस्कारों का ढिंढोरा पीटने वाली देश की इस सबसे बड़ी पार्टी में आखिरकार यह चल क्या रहा है ? यह सवाल आज दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है।
मुंडका से वज़ीरपुर तक: मारपीट और दलित उत्पीड़न के मामलों से सहमी पार्टी : अभी वज़ीरपुर की बीजेपी विधायक पूनम भारद्वाज और अशोक विहार की निगम पार्षद वीना असीजा के बीच हुए उस हाई-प्रोफाइल 'थप्पड़कांड' की गूंज ठंडी भी नहीं हुई थी, जिसमें खुद सांसद प्रवीण खंडेलवाल की मौजूदगी में सरेआम मारपीट और गालियों का खेल हुआ था, कि अब मुंडका से बीजेपी विधायक गजेंद्र दराल का एक और काला कारनामा सामने आ गया है।
मुंडका विधायक गजेंद्र दराल और वार्ड-32 के मंडल अध्यक्ष सुशील कुमार के बीच मारपीट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। आरोप है कि विधायक ने अपने ही दल के एक दलित मंडल अध्यक्ष सुशील कुमार को बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा, जिससे उनके पूरे शरीर पर गंभीर चोटों के निशान उभर आए हैं। पीड़ित ने कंझावला थाने में शिकायत दी, लेकिन हैरानी की बात यह है कि दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने FIR दर्ज तक नहीं की।
इस गंभीर मामले पर राजनीति गर्माने के बाद अब 'आम आदमी पार्टी' (AAP) भी मैदान में कूद पड़ी है। 'आप' नेता कुलदीप कुमार पीड़ित सुशील कुमार को साथ लेकर डीसीपी ऑफिस पहुंचे और एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत मुकदमा दर्ज कर विधायक की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की है। 'आप' ने इसे सिर्फ आपसी कलह नहीं बल्कि एक दलित युवक को कई घंटों तक बंधक बनाकर प्रताड़ित करने का घिनौना मामला करार दिया है, जिससे दलित समाज में भारी गुस्सा है।

मामले के तूल पकड़ने पर दिल्ली बीजेपी के प्रदेश महामंत्री विष्णु मित्तल ने मुंडका विधायक और मंडल अध्यक्ष दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी कर 16 सितंबर तक अनुशासन समिति के समक्ष स्पष्टीकरण देने को कहा है। लेकिन पार्टी के भीतर ही इसे महज एक लीपापोती और खानापूर्ति माना जा रहा है। वज़ीरपुर वाले 'थप्पड़कांड' में भी अनुशासन समिति ने जांच रिपोर्ट में विधायक परिवार को दोषी माना था, लेकिन अंत में दोनों पक्षों को हल्की-फुल्की चेतावनी देकर मामले को दबा दिया गया।
सांसदों की शह और बेबस नेतृत्व: क्या कागजी बनकर रह गई है अनुशासन समिति ? जानकारों का कहना है कि मुंडका के मामले में भी ऐसा ही हस्र होने वाला है, क्योंकि इन बागी और मनमाने नेताओं के सिर पर पार्टी के बड़े सांसदों—योगेंद्र चंदोलिया और प्रवीण खंडेलवाल—का हाथ है। चर्चा तो यहाँ तक है कि चांदनी चौक से सांसद प्रवीण खंडेलवाल का वज़ीरपुर क्षेत्र में इतना दखल है कि लोग यह चुटकी लेते हैं कि वे चांदनी चौक के सांसद हैं या वज़ीरपुर के! वहीं मुंडका में भी सांसद योगेंद्र चंदोलिया और विधायक गजेंद्र दराल की जुगलबंदी के आगे स्थानीय संगठन पूरी तरह पस्त है।
मुंडका या वज़ीरपुर तो महज बानगी भर हैं, दिल्ली बीजेपी के लगभग हर दूसरे कोने में यही हाल है : -
शकूरपुर विधानसभा: विधायक करनैल सिंह और निगम पार्षद विनीत वोहरा के बीच आपसी कलह और गाली-गलौज के बाद पार्षदों ने विधायक का खुला बहिष्कार कर रखा है।

मॉडल टाउन: विधायक अशोक गोयल देवराह और वहां के निगम पार्षदों के बीच छिड़ी शीतयुद्ध किसी से छिपी नहीं है।
आगामी एक साल बाद होने वाले नगर निगम (MCD) चुनावों को लेकर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अंदर ही अंदर थर-थर कांप रहा है। पार्टी आलाकमान लगातार बैठकें कर डैमेज कंट्रोल की कोशिश में है, ताकि इन झगड़ों का असर चुनावों पर न पड़े। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बीजेपी की ऐसी कौन सी मजबूरी है कि गंभीर आपराधिक आरोपों और अनुशासनहीनता के बावजूद वह इन रसूखदार विधायकों पर शिकंजा कसने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही? क्या पार्टी की अनुशासन समिति सिर्फ कागजी शेरों को डराने के लिए है? जनता और पार्टी कार्यकर्ता अब इसका जवाब मांग रहे हैं।

लेखक




टिप्पणियाँ
0