दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लासरूम: पढ़ाई, नाटक और यादों के बीच सिमटी छात्रों की जिंदगी
सत्य निकेतन में हालिया हादसे के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के क्लासरूम छात्रों के अध्ययन, संवाद और जीवन के अहम केंद्र बने हुए हैं।

देश के विभिन्न हिस्सों से दिल्ली आने वाले विद्यार्थियों के लिए कॉलेज के क्लासरूम केवल पढ़ाई का जरिया नहीं, बल्कि उनकी दिनचर्या का मुख्य केंद्र हैं। दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को छात्रों के रहने वाली एक इमारत ढहने की घटना के बीच इन युवा छात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी और उनके परिसरों की अहमियत पर ध्यान गया है। घर से दूर किराए के छोटे कमरों में रहने वाले इन युवाओं की अधिकांश गतिविधियां इन्हीं परिसरों के इर्द-गिर्द घूमती हैं।
सत्य निकेतन के निकट स्थित आर्यभट्ट कॉलेज में कक्षाओं का माहौल काफी जीवंत नजर आता है। यहां के कमरों में लकड़ी की बेंचें, पंखे और प्रोजेक्टर लगे हैं। ब्लैकबोर्ड पर इतिहास के व्याख्यान से जुड़े शब्द जैसे 'ग्रेट डिप्रेशन', 'पॉल वॉन हिंडनबर्ग' और 'हिटलर टेक्स ओवर द राइख' लिखे देखे जा सकते हैं, जिनके बीच छात्र अपनी अगली कक्षा का इंतजार करते हैं।
इसी कॉलेज में व्याख्यान समाप्त होने के बाद भी कई छात्र कमरों में रुककर साहित्य पर चर्चा करते दिखाई देते हैं। विद्यार्थी जेन ऑस्टेन के उपन्यास 'प्राइड एंड प्रेजुडिस' में मिस्टर कोलिन्स के प्रपोजल वाले दृश्य पर आपस में विचार-विमर्श करते हैं। जब गलियारों में सन्नाटा पसरता है, तब भी क्लासरूम का यह कोना संवाद का माध्यम बना रहता है।
वहीं सेंट स्टीफंस कॉलेज के क्लासरूम अपनी ऐतिहासिक धरोहर को संजोए हुए हैं। यहां कक्षाओं की दीवारों पर पूर्व प्राध्यापकों के फ्रेम किए गए श्वेत-श्याम चित्र लगे हैं, जिनमें वर्ष 1916 से 1953 तक संस्कृत पढ़ाने वाले पंडित लछमी धर और 1916 से 1948 तक अरबी व फारसी पढ़ाने वाले एस. अजहर अली शामिल हैं। कमरे के पुराने टंबलर स्विच और मेज पर रखे डस्टर कॉलेज के पुराने स्वरूप को दर्शाते हैं, जबकि छात्रों की बेंचों पर उकेरी गई आड़ी-तिरछी कलाकृतियां उनकी मौजूदगी बयां करती हैं।
हिंदू कॉलेज में कक्षाओं का उपयोग केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि छात्र लेक्चर्स के बीच के समय में नाटकों का पूर्वाभ्यास भी करते हैं। ब्लैकबोर्ड के सामने खड़े होकर संवाद बोलना, शिक्षक की मेज पर बैठकर अभिनय के हाव-भाव परखना और फर्श पर बैठकर अभ्यास करना यहां आम बात है। सहपाठी बेंचों पर बैठकर साथी कलाकारों के अभिनय की बारीकियों का मूल्यांकन करते हैं।
विश्वविद्यालय के विभिन्न परिसरों में शिक्षक के आने से पहले का समय अक्सर हंसी-मजाक से भरा होता है। कहीं कोई छात्र क्लास के बीच खाली जगह में दोस्तों के मनोरंजन के लिए नागिन डांस करने लगता है, तो कहीं छात्र आगे बढ़ने के लिए बेंचों के ऊपर से कूदते हैं। यह अनौपचारिक माहौल राजधानी के इन साधारण कमरों को छात्रों के लिए एक सुरक्षित और अपना सा ठिकाना बना देता है।
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