हरिद्वार में 116वां मुल्तान जोत महोत्सव : मां गंगा के साथ खेली गई अनोखी 'दूध की होली', दिल्ली से श्रद्धालुओं संग पहुंचे पूर्व विधायक डॉ. महेंद्र नागपाल
हरिद्वार के हर की पौड़ी पर 116वां मुल्तान जोत महोत्सव धूमधाम से मनाया गया, जहां पूर्व विधायक डॉ. महेंद्र नागपाल के नेतृत्व में दिल्ली से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने मां गंगा के साथ दूध की होली खेली। यह ऐतिहासिक परंपरा वर्ष 1911 में मन्नत पूरी होने के बाद शुरू हुई थी, जिसे मुल्तानी समाज आज भी अटूट श्रद्धा के साथ निभा रहा है।

-राजेंद्र स्वामी ,दिल्ली दर्पण हरिद्वार / दिल्ली: आस्था, परंपरा और सामाजिक सौहार्द के प्रतीक 116वें 'श्री मुल्तान जोत महोत्सव' के अवसर पर हरिद्वार का हर की पौड़ी घाट भक्ति के अनोखे रंगों में सराबोर हो उठा। अखिल भारतीय युवा मुल्तान जोत महोत्सव एवं अखिल भारतीय मुल्तान संगठन के तत्वावधान में आयोजित इस भव्य धार्मिक उत्सव में देशभर से आए हजारों श्रद्धालुओं ने मां गंगा के साथ दूध और गुलाल की होली खेली। दिल्ली से बड़ी संख्या में पहुंचे भक्तों का नेतृत्व दिल्ली के पूर्व विधायक और संगठन के वरिष्ठ संरक्षक डॉ. महेंद्र नागपाल ने किया।
डॉ. महेंद्र नागपाल 15 वर्षों से निरंतर बढ़ा रहे परंपरा को आगे : दिल्ली में अखिल भारतीय युवा मुल्तान जोत महोत्सव का स्वरूप दिन-प्रतिदिन विशाल होता जा रहा है। पूर्व विधायक डॉ. महेंद्र नागपाल पिछले 15 वर्षों से भी अधिक समय से इस ऐतिहासिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने तथा आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी वे दिल्ली से हजारों श्रद्धालुओं के साथ हरिद्वार पहुंचे। डॉ. नागपाल के संयोजन में भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसके उपरांत श्रद्धालुओं ने मां गंगा पर दूध अर्पित कर सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की।

116 साल पुरानी परंपरा: कैसे और क्यों शुरू हुआ यह महोत्सव? मुल्तान जोत महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1911 में हुई थी, जिसका इतिहास 116 साल पुराना है। परंपरा की शुरुआत: अविभाजित भारत में पाकिस्तान स्थित मुल्तान शहर के निवासी व्यवसाई लाला रूपचंद के घर में संतान सुख टिक नहीं पा रहा था। जब उनकी 11वीं संतान (पुत्री) गंभीर रूप से बीमार हुई, तो किसी शुभचिंतक की सलाह पर उन्होंने मुल्तान से हरिद्वार तक की पैदल यात्रा की। गंगा मैया को जोत अर्पण: लाला रूपचंद ने मुल्तान से पैदल चलकर हरिद्वार पहुंचकर मां गंगा के समक्ष जोत (अखंड ज्योति) प्रज्ज्वलित कर प्रवाहित की और पुत्री के स्वास्थ्य व वैश्विक कल्याण की मन्नत मांगी। उनकी मन्नत पूरी होने के बाद यह व्यक्तिगत आस्था एक सामूहिक वार्षिक उत्सव में बदल गई।

देश विभाजन के बाद भी अटूट आस्था :- 1947 में देश के विभाजन के बाद मुल्तानी समाज के लोग भारत के विभिन्न हिस्सों (विशेषकर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा) में बस गए। हालांकि, उन्होंने अपनी इस सांस्कृतिक व धार्मिक परंपरा को टूटने नहीं दिया और हर साल श्रावण/भाद्रपद मास में हरिद्वार एकत्र होकर जोत विसर्जन और दूध की होली मनाने का सिलसिला जारी रखा। हरिद्वार में आयोजित इस उत्सव के दौरान भक्तों ने न केवल धार्मिक अनुष्ठान किए, बल्कि मां गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने का संकल्प भी दोहराया।

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